*कही रिमझिम तो कही तेज़ बारिश के बीच मन्नातधारी शेरों का निकला विशाल जुलूस, ताजियों पर जाकर दी सलामी,* *रोजा रखकर, नमाज़ अदाकर दुआएं आशुरा पड़ी गईं*

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मालवा लाइव।रफीक कुरैशी द्वारा 

आलीराजपुर | मंगलवार को मोहर्रम पर्व यौमे आशुरा एवं हजरत ईमाम हुसैन की शहादत को लेकर नगर में कई धार्मिक आयोजन हुए। हजरत ईमाम हुसैन की याद में मनाए जाने वाले इस पर्व को समाजजनों ने आस्था एवं परम्परानुसार मनाया। समाजजनों ने मोहर्रम पर्व के योमे आशुरा के अवसर पर रोजा रखकर विशेष नमाज अदा कर खुदा की इबादत की। इस अवसर पर नगर में हलीम व खिचड़े की प्रसादी आमजनों को वितरित की गई। मंगलवार दोपहर को नगर में कई मन्नतधारी युवक का विशाल जुलूस निकला।  मोहर्रम पर ताजियादारों के साथ मन्नाती शेर बनकर ताजियों को सलामी देने का रिवाज कायम है। इस वर्ष नगर में 15 से 20 छोटे-बड़े मन्नाती शेर बनाए गए। मोहर्रम कमेटी अध्यक्ष तसद्दुक चंदेरी ने बताया की शेर जुलुस का आगाज़ जुल्फीकार से किया गया। इसमें बच्चों के साथ युवाजन भी शामिल थे।  दोपहर को नगर कही रिमझिम तो कही तेज़ बारिश के बीच मन्नतधारी युवक का विशाल जुलूस नगर के प्रमुख मार्ग से  निकला। जुलुस मे युवाजन धार्मिक ध्वज के साथ तिरंगा ध्वज लहराकर चल रहे थे | 

जुलूस में शेर बने युवकों को देखने के लिए भारी भीड़ जुटी। डीजे पर कव्वालियों की धुन पर युवा झूमते हुए नजर आए। जुलूस के साथ हुसैनी अखाड़ा के कलाकार जोरदार करतब दिखाते हुए चल रहे थे। मोहर्रम पर्व को लेकर नगर मे जिला प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक प्रबंध किए थे।

*यौमे आशुरा का विशेष महत्व*

जामा मस्जिद के पेश इमाम ने बताया कि यौमे आशूरा सभी मुसलमानों के लिए बेहद अहम दिन है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार आशूरा या मोहर्रम के 10वें दिन पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। वर्ष 680 ईस्वी में इमाम हुसैन और उनके अनुयायी कर्बला के मैदान में शहीद हुए थे। इस्लामी कैलेंडर के अनुसार मोहर्रम साल का पहला महीना है। इस दिन कई मुस्लिम समुदाय के लोग रोजा रखते हैं। आशूरा और उसके एक दिन पहले रोजा रखने की बहुत फजीलत है।

दो फोटो --स्लगन |

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