आधुनिक युग मे गांव के लोग आज भी प्रकृति से ही आने वाली फसलों और मौसम का अनुमान लगाते है

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रायपुरिया। राजेश राठौड़

गाव के बुजुर्ग आने वाले मानसून का व फसलों का अनुमान पेड़ व पेड़ पर लगने वाले फलों से लगाते है। कब कितनी बारिश होगी और कौन सी फसल अच्छी पकेगी।

रायपुरिया के 70 वर्षीय बुजुर्ग चुन्नीलाल पाटिदार बताते है कि हमने बचपन से ही हमारे बुजुर्गों से फसलो का ओर मौसम का अनुमान लगाना सीखा है। जैसे सेमल के पेड़ पर अगर फल अच्छा लगें तो कपास की फसल अच्छी होगी और बबूल पर फलियां ज्यादा लगती है और मूंग की फसल अच्छी होती है। इमली पके तो मूंगफली अच्छी पकती है।

 वही गाव के सेवानिवृत व्याख्याता पी एन पंवार ने भी अपने अनुभव से बताया कि गावो में आज भी ज्यादातर लोग  प्रकृति को देखकर ही मौसम और आनेवाली फसलों का अनुमान लगाते है और उस पर अमल भी करते है। जैसे नीम के पेड़ पर अगर निम्बोली अच्छी पकती है तो मक्का ओर सोयाबीन की फसल अच्छी पकती है। उस वर्ष का मौसम भी बेहतर होता है। कई लोग बादलो को देखकर बारिश का अनुमान लगाते है। जिसमे एक कहावत है कि "तीतर वरणी बादली विधवा काली रेख, या बरसे वा घर करे इसमें मीन न मेख "मतलब की अगर आसमान में अगर छोटे छोटे टुकड़ों में बादल छाए हुए हों तीतर की तरह काले सफेद रंग के हो जिसे गावो में झितरी या काबर बदली कहते है। इसके आसमान में छाने से अवश्य बारिश होती ही है। इसमें कोई मीन मेख नही यहां तक कि यह नदी में पुर ला देती है ओर अंडा ले चींटी चले तो बारिश की आस। इसका मतलब की चीटियां अपने अंडे लेकर चलती हुई दिखे तो बारिश जल्दी होने वाली है।इस तरह गाव के लोग अपना अनुमान लगाकर अपनी खेती करते है ।

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