रायपुरिया। राजेश राठौड़
होली का त्यौहार आते ही ग्रामीण अंचलों में रंग और पिचकारी से सज गई दुकाने रंगों के इस त्यौहार पर गावो में होली दहन के दिन छोटी छोटी बालिकाएं अपने हाथों से गाय के गोबर से बनी माला जिसे बरबुले कहते है उसे होली पर चढ़ाने जाती है साथ ही शक्कर से बनी एक प्रकार की मठाई जो हार कंगन के आकार मे दिखाई देती हे जिसे स्थानीय भाषा मे हार -गुजरी कहते है उसे अपने हाथों में गले मे पहन कर होली की पूजा करने जाती है फिर घर जाकर वो मिठाई आपस मे बाट कर खाते है यह मिठाई अब प्रायः लुप्त होती जा रही है कुछ ही व्यापारी ही इसे बाहर से लाकर बेचते है जब इस विषय पर व्यापारी कुलदीप श्रीमाल से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि पहले इन मठाई की होली के समय बहुत मांग रहती थी अंचलो में इसकी बिक्री बहुत ज्यादा होती थी पहले 40-50 पेटी की बिक्री हो जाती थी अब मुश्किल से लगभग 10 पेटी ही बिक पाती है फिर भी हम ग्राहक की मांग पर इस मिठाई को मंगवाते है वही किराना सामान के थोक व्यापारी नन्दलाला मालवी कहते है कि पहले इस तरह की मिठाई बड़े और बच्चे बड़े शोक से खरीदते थे और खाते थे गावो में प्रत्येक दुकानों पर यह मिठाई टँगी हुई मिल जाती थी लेकिन अब समय परिवर्तन होने से इन मिठाई को पसंद नही करते बाजर में अब कई तरह की मिठाइयां उपलब्ध है इस लिए इसका चलन अब कम हो गया है।
