घर घर तिरंगा, हर घर तिरंगा। विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झंडा ऊंचा रहे हमारा। आजादी के अमृत महोत्सव पर डाक विभाग ने जारी किया तिरंगे कि कहानी बयां करता डाक टिकट।

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महेश पाटीदार ,बदनावर


बदनावर । ध्वज का नाम लेते ही एक सम्मान की भावना मन में जागृत होती है फिर वह धर्म ध्वजा हो या फिर राष्ट्रध्वजा। आजादी के अमृत महोत्सव पर देश में घर-घर तिरंगा फहराने का जो माहौल देश में बना है उससे हर भारतीय के मन में निश्चित रूप से राष्ट्र के प्रति प्रेम की भावना उमड़ेगी ही और उमड़ना भी चाहिए क्योंकि तिरंगा हमारी आन बान और शान की निशानी है। भारतीय डाक विभाग ने हाल ही में 2 अगस्त के दिन तिरंगे के कल्पनाकार पिंगली वैंकैया के जन्म दिवस पर एक 75 रूपए की मिनिएचर शीट जारी की है। जिसमें भारत के ध्वज की पूरी कहानी बयां की गई है।


 जानकारी देते हुए डाक टिकट संग्रहाक ओम पाटोदी ने बताया कि भारतीय ध्वज पर स्वतंत्र भारत की पहली डाक टिकट 21 नवम्बर 1947 को विदेशी पत्राचार के लिए जारी की गयी थी। इसके पश्चात भारतीय ध्वज एवं इसके अभिकल्पक पिंगली वैंकैया पर भी डाक विभाग द्वारा डाक टिकट जारी किए गए हैं। 


गांधी जी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में कार्य करते हुए उनके मस्तिष्क में देश के एक ध्वज की परिकल्पना जागृत हुई और उन्होंने लगभग पाँच सालों तक तीस विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों पर शोध किया और 1921 में आपनी परिकल्पना से दो रंग वाला ध्वज देश को दिया। बाद में इसमें शांति का प्रतीक सफेद रंग और जोड़ा गया पहले झंडे में चरखा आया उसके बाद अशोक चक्र ने तिरंगे में अपना स्थान बनाया और इस तरह हमारे देश के राष्ट्रीय ध्वज की परिकल्पना साकार हुई और जन-जन में तिरंगा छा गया। भारतीय संविधान में ध्वज बनाने के एवं उसे फहराने के कई पैरामीटर तय किए गए हैं जिनका पालन करते हुए हर देशवासी को तिरंगा फहराना चाहिए।


ध्वज गीत याद दिलाता वो गुजरा जमाना 


विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,झंडा ऊंचा रहे हमारा। आज भी जब यह गीत बजता है तो हर भारतवासी की बांछे खिल जाती है, स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अपने आजादी के पहले के दिन याद आते हैं, वहीं 40 वर्ष से ऊपर के भारतीयों को अपने मिडिल स्कूल और प्राइमरी स्कूल के दिन याद आने लगते हैं। जब खाकी नेकर पर सफेद शर्ट में सुबह सुबह 6:00 बजे स्कूल के मैदान में एक लाइन से खड़े होकर यह गीत मास्टर साब  के साथ गाया करते थे।

क्या आप जानते हैं कौन हैं  इस गीत के रचयिता, कहां लिखा गया था ये गीत? शारद बहुत कम लोग जानकारी में होगा कि मानव समाज को कलंकित करने वाले जलिया वाले बाग़ हत्या कांड से आहत होकर पार्षद श्यामलाल गुप्त ने उस वक्त मारे गए लोगों की याद में झंडा ऊंचा रहे हमारा गीत की रचना जेल में बैठकर की थी। 


भारतीय डाक विभाग ने हमारी आजादी की दास्तां को कहने वाले कई डाक टिकट जारी किए हैं।

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