​तबादलों का डेडलाइन ड्रामा: क्या सियासत के गलियारों में अब समय की घड़ी भी मजबूर है? -कर्मचारी संगठन और राजनीतिक लोग भी तारीख बढ़ाने की कर रहे है मांग

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​भोपाल। मनोज जानी
मध्य प्रदेश में तबादलों का मौसम चल रहा है, लेकिन यह मौसम बहार कम और सस्पेंस ज्यादा पैदा कर रहा है। सरकार ने तबादलों के लिए 15 जून की डेडलाइन तय की थी। मुख्यमंत्री ने बड़े ही अधिकारपूर्ण लहजे में कह दिया था कि तारीख नहीं बढ़ेगी। लेकिन आज 15 जून की शाम ढलने को है, और सरकारी फाइलों की सरसराहट की जगह गलियारों में सन्नाटा पसरा है। अगर इक्का-दुक्का विभागों को छोड़ दें, तो बाकी सरकारी महकमों में तबादला सूचियाँ गायब हैं।

​सूत्रों की मानें तो अभी तक प्रभारी मंत्रियों, विभागीय मंत्रियों और संगठन की कोर कमेटी के बीच तबादला-योग पर कोई बैठक ही नहीं हुई है। अब सवाल यह उठता है कि क्या तबादले अदृश्य शक्तियों द्वारा किए जाएंगे? जब नियुक्तियों और नियुक्तियों के फेरबदल के लिए जिम्मेदार ही एक मेज पर नहीं बैठे हैं, तो फिर आदेशों की स्याही आखिर कहां से निकलेगी?
​यह स्थिति किसी हास्य-व्यंग्य फिल्म के दृश्य जैसी है, जहाँ निर्देशक (सरकार) ने शूटिंग का समय तो तय कर दिया, लेकिन मंत्री और संगठन अभी मेकअप रूम में ही उलझे हुए हैं।

​मुख्यमंत्री की सख्त चेतावनी तारीख नहीं बढ़ेगी हवा में तैर रही है, जबकि कर्मचारी संगठनों ओर राजनीतिक दल की ओर से तारीख बढ़ाने की मांग के सुर बुलंद हैं। एक तरफ अनुशासन का डंडा है, तो दूसरी तरफ सिफारिशों की लंबी फेहरिस्त। राजनीति के चतुर खिलाड़ी जानते हैं कि डेडलाइन का मतलब अंतिम अवसर नहीं, बल्कि मोलभाव का अंतिम दौर होता है। जब तक आखिरी मिनट की सुई नहीं टिकती, तब तक जुगाड़ की गणित चलती रहती है।

​तबादलों की यह प्रक्रिया अब प्रशासनिक कम और मैनेजमेंट की ज्यादा हो गई है। पारदर्शिता और नियमों के शोर के बीच, असल में वही अधिकारी-कर्मचारी अपनी मनचाही पोस्टिंग पाएंगे जिनकी पहुंच ऊपर तक है। बाकी तो बेचारे सिस्टम के नाम पर फाइलें ढोते रहेंगे और उम्मीद करेंगे कि शायद कल सुबह कोई चमत्कार हो जाए।
​क्या आज आधी रात को अचानक सूचियाँ जारी होंगी? या फिर नियमों को सुविधाजनक लचीलापन देते हुए तारीख बढ़ा दी जाएगी? अगर तारीख नहीं बढ़ती, तो क्या बिना सूची के ही इसे शून्य काल मान लिया जाएगा?
​सवाल बड़ा है
​यह प्रदेश का दुर्भाग्य ही है कि शासन की कार्यप्रणाली में समयबद्धता हमेशा शर्तों के अधीन रहती है। जनता और कर्मचारी टकटकी लगाए बैठे हैं कि आखिर ट्रांसफर-पोस्टिंग का यह खेल कब खत्म होगा।

क्या वे वाकई अनुशासन कायम रखेंगे या फिर संगठन और मंत्रियों के आगे तारीख को एक बार फिर हारते हुए देखेंगे ?
​तबादलों का यह डेडलाइन ड्रामा सिर्फ प्रशासनिक सुस्ती नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति को दर्शाता है जहाँ फाइलों से ज्यादा फायदे की चिंता की जाती है। अब देखना यह है कि रात के 12 बजने से पहले सरकारी मशीनरी जागती है या फिर कल सुबह किसी नए नियम का राग अलापा जाएगा।
​फिलहाल तो मध्य प्रदेश के दफ्तरों में हवा में एक ही सवाल तैर रहा है "अगली तारीख क्या है?"

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